31 2012 अक्टूबर इंदिरा गाँधी 28वी बरसी - एक सवाल उठा 84 के दंगो की बात क्यों नहीं ?
आज दिल्ली विश्वविद्यालय से वापस आते समय एक पोस्टर पर नज़र पड़ी। रिक्शे पर थी तो पूरा नहीं पढ़ पाई लेकिन इतना ज़रूर पढ़ पाई कि 31 अक्टूबर इंदिरा गाँधी 28वी बरसी। कुछ अजीब सा लगा। एक सवाल उठा 84 के दंगो की बात क्यों नहीं ?
31 अक्टूबर 1984, करीब 10 या 11 साल की मैं थी। अच्छी तरह याद है तब हम मिर्ज़ापुर में थे। स्कूल से करीब 4 बजे घर पहुंची। जोरो की भूख लगी थी। लेकिन घर जब पहुंची तो अम्मा ने कहा "इंदिरा गाँधी की हत्या हो गई है।" सब रेडिओ से चिपके समाचार को सुन रहे थे। मुझे ज्यादा तो कुछ नहीं समझ में आया। बस ये लगा की कुछ बहुत बड़ी घटना हो गई है।
दुसरे दिन सुबह पता चला कि स्कूल बंद है इंदिरा गाँधी की शोक में। कोई खास ख़ुशी तो नहीं हुई स्कूल बंद होने का।
दोपहर होते घर में कुछ चिंता नज़र आने लगी। अम्मा ने कहा दद्दू (मेरा सबसे बड़ा भाई) इलाहबाद में गुरूद्वारे में है। पता नहीं उसका क्या हाल। दद्दू ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया था। होस्टल न मिलने के कारण बाबू (मेरे पिताजी ) के दोस्त गुरुद्वारा महंत ने गुरूद्वारे में रहने की जगह दी थी। मैंने अम्मा से पूछा क्यों परेशान हो? दद्दू ठीक होगा। अम्मा ने कहा नहीं जिस तरह से दंगा हो रहा है सिखों को मारा जा रहा अगर उसको भी सिख समझ लिया तो? मुझे अम्मा ने कहा आज बहार खेलने मत जाना।
मेरे घर की रसोई से सड़क बिलकुल साफ़ दिखती थी। मुझे रसोई की खिड़की पर बैठ सड़क देखना बहुत अच्छा लगता था। मैं खिड़की पर बैठ गई। थोड़ी ही देर में करीब 4-5 लडको (करीब 17-18 साल के) का झुण्ड बड़ी तेज़ी से हाथ में बहुत सारे कपडे की थान उठाये भागते हुए दिखाई दिया। इसके कुछ देर बाद ही 2 लड़के, मैं दोनों को अच्छी तरह जानती थी हमारे ही मोहल्ले की थे। दोनों के हाथ में जूते के डब्बे थे। मैं अम्मा को आवाज़ दी। अम्मा ने मुझे डाँटते हुए कमरे में जाने के लिए कहा। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर हो क्या रहा है।
तीसरे दिन बाबु ने बहुत दुःख के साथ बताया की डॉक्टर भाटिया की x रे और उनकी क्लिनिक में आग लगा दी गई। डॉक्टर भाटिया की ही एक मात्र क्लिनिक थी जहाँ x रे की सुविधा थी। मैंने पूछा क्यों? बाबु ने जवाब नहीं दिया।
मुझे ये तो याद नहीं दद्दू कितने दिन बाद घर आया लेकिन उसने जो बयान किया वो बहुत ही खौफनाक था मेरे लिए। उसने बताया की एक भीड़ ने गुरूद्वारे पर हमला किया दद्दू सहित महंत जी छत पर भागे और बस पड़ोस के छत पर जाते समय महंतजी गली में गिर गए। दद्दू किसी तरह से कामयाब रहा पड़ोस की छत पर जाने में। महंत जी के गिरते ही भीड़ ने उनके गले में टायर डाल कर आग लगा दी। इलाहबाद से वो मिर्ज़ापुर कैसे आया मालूम नहीं।
करीब 15 दिन बाद स्कूल खुला। हम बच्चे बहुत खुश थे इतने दिनों बाद दोस्तों से मिलना होगा। क्लास में जाते ही दो नई शक्लें दिखाई दी। लेकिन डरी और सहमी ! ये कौन है? कुछ समय के बाद जैसे करेंट लगा अरे ये तो बलबीर और जसवंत हैं! लेकिन इनकी पगड़ी कहाँ गई? और ये इतने उदास क्यों है? जसवंत तो कुछ नहीं बोला लेकिन बलबीर रोने लगा रोते हुए उसने कहा उसके घर पर एक भीड़ ने हमला किया और उनकी पगड़ी उतार कर बाल काट दिए। बलबीर जोर जोर से रोने लगा।
मुझे अब भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है????
October 31, 2012 · Delhi ·
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