बीमार होना in covid19 time!
मेरे शरीर का टेम्प्रेचर 97.6 रहता है या इसके आस पास. यह अभी कुछ एक साल पहले पता चला. इसकी वजह से मुझे गर्मी कम सर्दी ज्यादा लगती है. इसको ले कर मेरे परिवार और दोस्त बहुत मजाक बनाते हैं.
अभी जब 2 जून को तबियत थोड़ी ठीक नहीं लगी तो चिंता हुई. मैंने अपना टेम्प्रेचर लिया 98.7 आया. कुछ समझ नहीं आया तो क्रोसिन खाया और काम करने लगी. 3 जून की शाम तक तबियत में कोई सुधार नहीं हुआ. तीसरी मीटिंग ख़तम होते ही मैं निढाल हो गई. मैंने अशोक को कहा थोड़ा तबियत ठीक नहीं लग रही. सबसे पहले विचार आया कोविड टेस्ट करवा लिया जाये। यह वह दिन था जब सरकार की तरफ से टेस्टिंग बंद कर दिया गया था. फिर भी पता किया कि मदन मोहन मालवीय अस्पताल में टेस्टिंग हो रही है. अस्पताल का नाम सुनते ही जैसे सांप सूंघ गया. एक बार रेबीज का इंजेक्शन लगवाने गई थी आज तक शक है की सुई बदली थी या नहीं। [जी सरकारी अस्पतालों का हाल बेहाल है]खैर हमारी बिल्डिंग में डॉक्टर हैं हमने उनसे सलाह ली। लॉक डाउन की शुरुवात में जब गले में खरास हुई तो उनसे ही सलाह ली थी. उन्होंने सिम्पटम्स पूछे और कहा घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है. उन्होंने कुछ दवाई लिखी। वो दिन जैसे तैसे गुज़ारा। लेकिन दूसरे दिन मेरी मानसिक स्थिति ने जवाब दे दिया। मैंने दीपा को फ़ोन किया जो स्वास्थ्य के मुद्दे पर काम करती हैं. उन्होंने ने कहा घबराने की ज़रूरत नहीं है. एक डॉक्टर और एक एम्स की नर्स का फ़ोन नंबर दिया जो कोविड की हेल्पलाइन जन स्वास्थ्य में हैं। मैंने पहले डॉक्टर को कॉल किया, जब उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया, तो नर्स को कॉल किया। उन्होंने तुरंत फ़ोन उठाया। सारी बात ध्यान से सुनी। उनकी सलाह थी मैं अपने को आइसोलेट कर लूँ, मास्क पहनू और न्यूज़/सोशल मीडिया तुरंत देखना बंद कर दूँ. कुछ घरेलु उपचार बताये और कहा घबराने की ज़रूरत नहीं। २ दिन अगर ठीक न लगे तो मैं फिर से कॉल करूँ। इसी बीच डॉक्टर का भी फ़ोन आया. उन्होंने सब कुछ बहुत हलके से लिया और कहा ऐसा कुछ भी नहीं बस पेरासिटामोल लेती रहूं ३ वक़्त। ये दिन मुश्किल में कटा.तीसरे दिन मैंने अपने जनरल फिसिशन को कॉल किया। क्योकि गले में भारीपन लग रहा था. उन्होंने विडिओ कॉल से मेरी आंख, नाक और गाला देखा। अल्लाह जाने क्या नज़र आया होगा उनको, लेकिन थोड़ा सुकून मिला चलो देखा उन्होंने। उन्होंने व्हाटअप से दवा लिखी और 500 रूपये फीस paytm से लिया। मेरी यह डॉक्टर अच्छी है. उन्होंने गरारे और स्टीम लेते रहने को कहा और एक हफ्ते बाद फिर कॉल करने को कहा. उस दिन कुछ देर दिमाग ठीक रहा लेकिन शाम होते होते मानसिक स्थिति ने फिर से करवट लेने लगी. रात किसी तरह कटी हर घंटे और आधी घंटे में प्यास और पसीने में गुज़ारे। चौथे दिन शाम को बुखार 99 था. मैंने अशोक को बोला - मेरा फीवर बढ़ रहा है । [जैसा की मैं पहले कह चुकी हूँ की मेरे शरीर का तापमान 97 के आसपास रहता है 99 मेरे लिए ज्यादा था] शरीर पस्त था और दिमाग का कचूमर बन गया था. हमने फिर से अपने बिल्डिंग वाले डॉक्टर को कॉल किया। उन्होंने रिलैक्स करते हुए कहा ये नार्मल है. घबराते नहीं। थोड़ी देर बाद अशोक ने भी मुझे समझने की पूरी कोशिश की "पैनिक मत हो." मैंने बल भर उसे सुनाया! "पैनिक कैसे न हो!"
[स्वास्थ्य ऐसी चीज है एक समय के बाद आप कितने भी सइंटिफिक हों आपकी बैंड बज जाती है और आप उस तरफ झुकते हैं जिसे विज्ञान माना करता है. जिसमे शामिल है अन्धविश्वास और तमाम वो चीजे करने लगते हैं जिनको विज्ञान और एलोपैथ नकारता है]
अब मैंने सारे घरेलु इलाज शुरू किये। डर इस कदर दिमाग पर हावी हो गया था. मैंने काढ़ा बनाया, पीपर घी गुड़ खाया, दूध हल्दी बनाया और लौंग खाना शुरू किया। पांचवे दिन शाम को शरीर का तापमान 97. 7 पर आया तो लगा ज़िंदा हूँ.
इन सबके बीच खुद को एक कमरे में बंद रखना बहुत मुश्किल था. सुबह उठ कर बालकनी में बैठना मिस कर रही थी. ऐसा लग रहा था दुनिया से अलग ही हो गई हूँ. कुछ दोस्त जो दफ्तर के साथियों के संपर्क में रहते हैं उन्हें जब पता चला तो उनके फ़ोन आने शुरू हुए. मैं फ़ोन उठाने की हालत में नहीं थी. क्योकि अब तक मैं पक चुकी थी जस्ट रिलैक्स, चिल, कूल डाउन, नथिंग हप्पेनेड, ये खाओ वो पियो। ब्रीथिंग एक्सरसाइज करो न जाने क्या क्या मेसेज व्हाटअप पर आने लगे. 5 दिन की दवाई के बाद थोड़ा आराम मिला। लेकिन गले की खराश जाने का नाम नहीं ले रही थी....
न ही कुछ लग रहा था न कुछ करने में. यह भी समझ रहा था की कैसे दिमाग को कैसे ठिकाने लगाए। लैपटॉप अपने कमरे में मैंने मंगाया और ढूंढने लगी डरावनी फिल्मे। चूँकि डरावनी फिल्मे मुझे पसंद नहीं तो कि यही देखते हैं. फिल्म में जो कुछ भी डरावने चरित्र हैं वो मुझे पूरी रात सोने नहीं देते। मुझे लगा यह ठीक होगा दिमाग में कुछ और फितूर चले. नेटफ्लिक्स बा मुश्किल मैंने बेताल ढूंढ कर निकली। लेकिन क्या बकवास फिल्म थी. पूरा २ घंटे बर्बाद किया। डर का नमो निशाँ नहीं। न ही उन डरावने चरित्रों ने मुझे डराया। इतनी घटिया डरावनी फिल्म ! खैर रात नीद कुछ ठीक आई. सुबह से तय किया जो भी हो दवाई खा कर काम किया जायेगा। बिस्तर एकदम नहीं पकड़ना। लेकिन सुबह के 11.30 बजते बजते तापमान फिर से बढ़ा और मैंने बिस्तर पकड़ा। कुछ देर बाद जब नीद खुली तो जबर्दस्त पसीना था. हाथ मुँह धो कर वापस कुछ मेल के जवाब दिए. खाना खाने के बाद फिर वही हाल. अब मुझे कोफ़्त होने लगी... क्या रूटीन बन गया है - सुबह उठो खड़ा पीओ, गरारे करो स्टीम लो, नास्ता करो दवा खाओ. विटामिन्स लो, अदरक की चाय पीओ फिर स्टीम लो. खाना खाओ. दवाई खाओ, चाय पीओ. खड़ा पीओ रात का खाना खाओ दवाई खाओ.
ज्यादा बोर हो तो खिड़की से बाहर झांकती । अक्सर मेरी निगाह खिड़की के बहार तभी जाती जब पड़ोसन कपडा फैलाने या समेटने आती. मेरा घर DDA फ्लैट में है. तो आस पास की बात सुनाई देती। लेकिन गर्मी बढ़ते हैं सिर्फ A/C की ही आवाज़ आती. लेकिन बाहर मौसम कैसा है या पता चल जाता। इन सबके बीच घर में अब अशोक पूरी तरह राज था. यानी खाना कपडा साफ़ सफाई, सोफे पर बदहवास आड़े तिरछे बैठना और न जाने क्या क्या! अशोक बीमार की सेवा अच्छी करता है बशर्ते बीमार व्यक्ति बिस्तर पर पड़ा हुआ होना चाहिए। अगर बीमार व्यक्ति जरा भी हिलता डुलता नज़र आया सेवा समाप्त। मैंने भी तय किया जब तक तबियत ठीक नहीं होती मैं कमरा क्या बिस्तर भी नहीं छोडूंगी। लेकिन है रे आदत! कुछ न कुछ लेने मैं निकल जाती। छठे दिन मैंने कोशिश की कि बालकनी में चाय पिया जाये। लेकिन १ मिनट में फिजिकल डिस्टेंसिंग का ख्याल आते ही वापस कमरे में. 7वे दिन मेरी एंटी बिओटिक ख़तम हुई. डॉक्टर ने कहा पैरासिटामोल लेते रहने को और गरारे और स्टीम करने को. दिमाग अब कुछ बेहतर था. काम शुरू किया। 8वे दिन पहली बार रातभर पंखा चला सो पाई. सुबह शरीर में फुर्ती दिखी. लेकिन नाश्ते के बाद जल्दी ही थकान भी महसूस हुआ। 5 मिनट की झपकी के बाद खुद को धकेला। उठो बस बहुत हो गया. मैंने अपना लैपटॉप, मोबाइल, हैडफ़ोन, स्पीकर सब चार्ज करने को लगाया। बेडकवर कुशन कवर बदले! कमरे को व्यवस्थित किया और याद किया अपना एक साल जो ज्योति कुञ्ज (BHU) हॉस्टल में बिताया था. बस कमी थी एक टेबल की. जिसकी कमी पूरी की छोटी बेड टेबल ने. कुछ इ-मेल्स देखे और कुछ जो काम 3 तारीख को छोड़ा था उसको पूरा किया। शाम को छोटे से बाथरूम के किसी तरह नहाने की कोशिश की. थोड़ा दिमाग में तरेरी आई.
9वां दिन बेहतर लगा. लगा ज़िन्दगी पटरी पर आ रही है. लेकिन वही एक कमरे के भीतर। नाश्ता करने के बाद और ऑफिस की कॉल खतम करने के बाद सर के बाल धोने का मन बनाया गया. इस बार मेरी नज़र कमरे के कोने में पड़े मेरे ट्रेवल बैग पर गई. जो जनवरी में बंगलोर से आने के बाद जस का तस पड़ा था. उसमे से शैम्पू निकला और छोटे बाथरूम किसी तरह सर धोया गया. शायद 11 दिन बाद! लगा सर से किलो भर बोझ हटा रही हूँ. न कोई थकान खैर... ! अब 9वे दिन से आगे बढ़ना है अभी 5 दिन और है!
सब कुछ ठीक रहा तो एक लम्बे पोस्ट के साथ बाकी के 5 दिन की बीती बात आपको बताउंगी।
बस कोई उपाय, नुस्खा और टेस्ट के बारे में सलाह ना देना !
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9th June 2020
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